कमाल की खूबसूरत थी वो, जुबां से ज्यादा आँखोंसे बोला करती थी। यूँ तो बतियाने से भी डरती थी वो, पर प्यार हमसे बेहिसाब किया करती थी।
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भूल गए हैं कुछ लोग हमे इस तरह यकीन मानो यकीन ही नहीं आता😓
शायरों की बस्ती में कदम रखा तो जाना, गमों की महफिल भी कमाल जमती है।
उदास कर गई आज की शाम भी मुझे जैसे भुला रहा हो कोई आहिस्ता-आहिस्ता
दिल का मौसम कभी तो खुशगवार हो जाये एक पल को सही तुझे भी मुझ से प्यार हो जाये🥰
यादें भी, करवट बदल रही हैं और मैं यूं तनहा तनहा सा हूँ वक़्त भी जिससे रूठ गया है अब मैं वो बेबस, लम्हा सा हूँ
पत्थर के ख़ुदा, पत्थर के सनम, पत्थर के ही इंसाँ पाए हैं तुम शहर-ए-मोहब्बत कहते हो हम जान बचा कर आए हैं
लोग कहते हैं दुःख बुरा होता है जब भी आता है रुलाता है मगर कहते हैं दुःख अच्छा होता है जब भी आता है कुछ सिखाता है🙏
आख़िर तुम भी उस आइने की तरह ही निकले, जो भी सामने आया तुम उसी के हो गए।


🙏Thanks for suggestion 🙏