पड़ जाता हूँ मैं बड़े असमंजस में.... जब वो कुछ बोलती नहीं... पर जब को बोलती है... पागल कर देती है
पुरानीं बातें जो हैं.... उन्हें भूल जाया जाए... और सीखों को याद रखा जाए.. बस यही है बेहतरीन ज़िन्दग़ी जीनें का राज़
तुमसे बिछड़नें के बाद... संसय ये है कि.... टूटकर रोये हैं.... या.... रो रो कर टूट गए हैं....
तुमनें क्यों सोच लिया .... हमसे दूर रह लोगे... क्या तुम्हें उतना इश्क़ नहीं हमसे..... जितना हमें है तुमसे
बड़ी शिद्दत से इज़्ज़त कमाई उसनें... उसी सिद्दत से मैं भी..... उससे वो हुनर सीखता रहा...
वो ख़ुद को ख़ुदा बतानें में जुटा रहा... मैं उसे ख़ुदा बनानें में जुटा रहा....
किसी नें हमें बताया ही नहीं... की हुनरमंदी रखते हैं हम भी....
बस एक तू ही है... जो ज़रा ताऱीफ करता है मेरी.. बेवज़ह ख़ाक नहीं होते आशियानें यहाँ..
आग लगनें की भी कुछ वज़हें होती हैं... मैनें हुश्न देखे तो हैं बहोत सारे.... पर तुझे देखना ज़रूरी है अब...
सुना है मर जाते हैं लोग... तेरी ज़रा सी... मुस्कुराहट पर.... मामले की तह तक पहुँच पाना..... इतना भी आसान नहीं है....
वो कहते हैं.... कि.... एक फैसला करनें में ख़ुदा को भी मौत तक रुकना पड़ता है.... इन क़िताबों के ख़ामोश लबों को.... ज़रा ग़ौर से देखिए....
झील की शकल इख़्तियार कर बैठे हैं.... सैलाब लेकर हर कड़ी जोड़कर देखिए.... शायद ग़लत होनें का भरम ख़त्म हो जाये....
रिस्ते ख़त्म होनें पर... ज़रूरी नहीं... की ज़िम्मेवार आप ही हों तारीखेँ भी अपनें आप में बहोत कुछ कहतीं रहती हैं....
किसी के लिए उनका मतलब कुछ भी नहीं... और किसी के लिए शायद ज़िन्दगी हैं वो...
वो हर बात बड़े ग़ौर से..... सुनता रहा मेरी... जब मना करनें की कोई वजह न मिली तो कहा.... की आज दिन अच्छा नहीं है ....

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